Bade Baba Temple
Bade Baba Temple, Kundalpur is a temple in the Kundalpur, a pilgrimage town of Jain, in Damoh district of Madhya Pradesh. It is 35 km from Damoh City or District headquarter. The Bade Baba Temple was formally known as Shri Digamber Jain Siddha Kshetra Kundalpur.[1][2][3]
| Bade Baba temple, Kundalpur | |
|---|---|
Kundalgiri, Kundalpur | |
![]() Planned structure of Bade Baba temple | |
| Religion | |
| Affiliation | Jainism |
| Deity | Rishabhanatha |
| Festivals | Mahavir Jayanti |
| Governing body | Shri Digamber Jain Atishay Chhetra Kundalpur Public Trust |
| Location | |
| Location | Kundalpur, Damoh, Madhya Pradesh |
![]() Location in Madhya Pradesh | |
| Geographic coordinates | 23°58′47.934″N 79°43′27.116″E |
| Architecture | |
| Date established | 1999 |
| Completed | Under construction |
| Specifications | |
| Temple(s) | 1 |
| Monument(s) | 01 |
| Inscriptions | Stone |
| Elevation | 550 m (1,804 ft) |
| Website | |
| shreebadebaba | |
The ancient idol of Jain (24 Tirthankars) Pratham Tirthankar "1008 Shri Shri Adinath Bhagwan" (Bade Baba) situated there with world class temple structure. Popularly know as "Vishava ka Sabse Bada mandir ji" constructed under the guidance and Blessings of Pujya 108 Acharya guruvar Shri Vidyasagar ji Maharaj ji.
ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती का यह आर्यावर्त जिसका नाम भारत है..अनादिकाल से जैन धर्म के जीवंत होने का साक्षी है. भारत के मध्य में स्थित हैं मध्यप्रदेश.जिसे प्रकृति ने अपनी हर जलवायु का आशीर्वाद दिया है..यहीं दमोह जिला ,पटेरा तहसील में स्थित हैं कुण्डलपुर जी सिद्ध क्षेत्र यह क्षेत्र अंतिम श्रुत केवली श्रीधर केवली की मोक्ष स्थली है और यहाँ अर्धचन्द्राकार पर्वत पर विराजमान हैं अतिशयकारी लगभग १५०० वर्ष पुराने पंद्रह फीट ऊँचे पद्मासन लगाये श्री १००८ आदिनाथ भगवान, जिन्हें हम बड़े बाबा कह कर बुलाते हैं.
कुण्डलपुर जी सिद्ध क्षेत्र , बड़े बाबा का अतिशय क्षेत्र प्राचीन मंदिरों का गढ़ है. जहाँ लगभग २४०० वर्ष पुराने श्रीधर केवली के चरण विराजमान हैं. पहाड़ एवं तलहटी में लगभग ५०० वर्ष पूर्व के ६१ और जिन मंदिर हैं, जिनमे पार्श्वनाथ भगवान और चंद्रप्रभु भगवान के दर्शन बहुतायत में मिलते हैं. यहाँ आस पास के क्षेत्र में गुप्तकाल की प्रतिमाओं का भी उल्लेख है.
इन सबसे ऊपर विराजमान हैं कुंडलपुर के बड़े बाबा श्री १००८ आदिनाथ भगवान लगभग १५०० वर्ष पुराने मंदिर जी एवं सिंहपीठ आसन पर विराजमान हैं.
भगवान श्री आदिनाथ (वृषभ) जब तृतीय काल में चौरासी लाख वर्ष पूर्व तीन वर्ष साढ़े आठ महीने प्रमाण काल शेष रह गया था तब श्री आदिनाथ जी का जन्म हुआ था। भगवान श्री आदिनाथ जी के अन्य नाम भी हैं जैसे- भगवान श्री वृषभनाथ जी, भगवान श्री ऋषभनाथ जी, भगवान श्री पुरूदेव आदि। इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित नाम भगवान श्री आदिनाथ है। भगवान श्री आदिनाथ इक्ष्वाकु वंश के थे। भगवान का वर्ण तपाये हुये स्वर्ण के समान था।
भगवान आदिनाथ के वैराग्य का कारण नीलाज्जना नर्तृकी का नृत्य करते हुए भरण को प्राप्त होना था। श्री आदिनाथ भगवान की दीक्षा चैत्र कृष्ण नवमीं अपरान्ह समय उत्तराषाढा नक्षत्र में हुई थी। भगवान ने दीक्षा के पश्चात् एक हजार वर्ष तक तप किया। भगवान श्री आदिनाथ जी का प्रथम आहार श्रेयांश राजा द्वारा इक्षुरस आहार द्वारा हस्तिनापुर नगर में हुआ था। प्रथम आहार एक वर्ष उन्तालीस दिन पश्चात् हुआ था।
भगवान श्री आदिनाथ को पुरिमतालपुर नगर के शकटास्य नामक उद्यान में वटवृक्ष के नीचे फाल्गुन वदी ग्यारस को केवलज्ञान प्राप्त हुआ था। भगवान के समवशरण में चौरासी गणघर विराजते थे। इनमें प्रमुख गणघर श्री ऋषभ सेन जी थे। श्री भगवान आदिनाथ स्वामी ने विदेह क्षेत्र की व्यवस्था के अनुसार क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र इन तीन वर्णो का प्रतिपादन किया था। एवं प्रजा को असिकर्म (शस्त्र विद्या), मसि कर्म (लेखन विद्या, तथा कृषि कर्म, वाणिज्य, शिल्प, विद्या आदि षटकर्म सिखाया था। श्री आदिनाथ भगवान ने तृतीय काल में कैलाश पर्वत से माघ वदी चौदह को पूर्वान्ह काल में मोक्ष प्राप्त किया था । उस समय चतुर्थ काल प्रारंभ होने में तीन वर्ष आठ माह और पन्द्रह दिन शेष रह गये थे।
अतिशय............................
कुण्डलपुर जी का अतिशय बहुत निराला और प्राचीन है, श्रीधर केवली की निर्वाण भूमि होना, यह अवगत कराती है कि ईसा से छह शताब्दियों पूर्व भगवान महावीर स्वामी का समवसरण यहाँ पर आया था. तथा पहिली बार प्रतिमा जी के दर्शन भट्टारक सुरेन्द्र कीर्ति जी को पहाड़ पर हुए, उन्होंने प्रतिमा जी को खुदाई कर निकलवाया और प्रभु के सर पर छत की व्यवस्था करवाई. परन्तु कुछ वर्षों पश्चात राजा छत्रसाल जब मुगलों के हाथों राज्य हार कर वन वन भटक रहा था और भटकते भटकते शांति की खोज में कुण्डलपुर जी पहुंचा और श्री १००८ आदिनाथ भगवान के चरणों में बड़े बाबा के मंदिर बनवाने के भाव रख पुनः राज्य विजय को निकला, और जीत गया, कालांतर में विक्रम संवत १७५७ ई को राजा क्षत्रसाल ने बड़े बाबा के मंदिर जी का निर्माण कराया,एवं पंचकल्याणक कराया.
अतिशय की सबसे बड़ी घटना तो वह थी, जब मूर्ती पूजा विरोधी औरंगजेब अपनी बड़ी भरी सेना लेकर पहाड़ पर चढ़ आया और उसने बड़े बाबा की प्रतिमा को खंडित करने का असफल प्रयास किया, जैसे ही उसने प्रतिमा जी के दाहिने पैर के अंगूठे पर तलवार का वार किया, पैर के अंगूठे से दूध की धार निकल पडी, वह जान बचाकर वहां से जैसे ही भागा मधुमक्खियों ने उस पर और उसकी सेना पर आक्रमण कर दिया. बड़े बाबा के दाहिने पैर के अंगूठे का निशान और मधुमक्खियों के शांत और व्यवस्थित छत्ते इसी बात का प्रमाण हैं.
कुण्डलपुर से निकटतम रेलवे स्टेशन ३५ किलोमीटर दूरी पर स्थित है एवं निकटतम हवाईअड्डा १५० किलोमीटर दूर जबलपुर में उपलब्ध है | यहाँ पहुंचने के लिए सड़क पहुंच मार्ग सबसे सरल एवं सुगम जरिया है | कुण्डलपुर तीर्थस्थान अनिवार्य रूप से पर्यटकों के आकर्षण के साथ एक तीर्थ स्थल भी है। आस-पास के स्थान जैसे जबलपुर, बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान , खजुराहो के मंदिर और पन्ना राष्ट्रीय उद्यान से निकट है
References
Citation
- Titze & Bruhn 1998, p. 125.
- Sen.
- Hindustan Times 2006.
Source
- Titze, Kurt; Bruhn, Klaus (1998). Jainism: A Pictorial Guide to the Religion of Non-Violence (2 ed.). Motilal Banarsidass. ISBN 978-81-208-1534-6.
- Sen, Abha. "Patika Artical Of MP Tourism". Rajasthan Patrika.
- "Kundalpur temples not protected". Hindustan Times. 14 April 2006.

